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Bachpan Se aab tak
बचपन की यादें याद आती हें हज़ारों खुशियाँ भर लाती हैं वो गुज़रा लम्हा याद आता हें आखें मेरी भर जाती जाती हँ
माँ की थपकी याद आती हें याद आता हॅ पापा का प्यार बादशाह थे हम भी सड़को के घर के थे हम राज दुलार
हो छोटा सा भी गम अगर शाह ना पाती थी वो फेला कर अपना आँचल ममता से सहलाती थी वो
था चौड़ा सीना पापा का जो आने ना देते दुशमन पास बड़े बड़े से भी लड़ भिड़ने की हममें थी तब कितनी आस
छूट गया जो दामन उनका पल मे ले कर खुशियाँ हज़ार बचपन गुजरा आई ज़बानी फिर मिल ना पाया वेसा प्यार
अब चिंता कुछ बन जाने की करके सबसे आँखें चार पेसा पेसा करते रहते चाहे घर हो या हो यार
घर में हें खाने की चिंता बाहर दिखाते दौलत अपर पल में शोला पल में शबनम लगती हें वो गुलबहार
चंद्रमुखी, सूरजमुखी, बन जाती हॅ जुवालामुखी हो गये हम दो से चार ना तुम सुखी ना हम सुखी
चली गयी वो दौलत सारी जिसका था हमें गुबार बुलबुला था पानी का जो बह गया बेसुमर
अब तो इंतजार हें उस पिता का जो जाग का हें पालनहार बरसा दे तू दौलत अपनी हो जाऊं मॅ मालामाल
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